Unit 2

Unit II : सैद्धांतिक योगदान

क. मुख्यधारा/पुरुषधारा आईआर सिद्धांतों को नारीवादी चुनौती (The feminist challenge to mainstream/malestream IR theories – Extended)

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (आईआर) के मुख्यधारा या पुरुषधारा (malestream) सिद्धांतों को नारीवादी विद्वानों द्वारा दी गई चुनौती एक व्यापक और बहुआयामी हस्तक्षेप है जिसने अनुशासन की नींव को हिला दिया है। यह चुनौती इस गहरी बैठी मान्यता पर आधारित है कि पारंपरिक आईआर सिद्धांत, अपनी मान्यताओं, अवधारणाओं और पद्धतियों में, अनिवार्य रूप से पुरुषों के अनुभवों और दृष्टिकोणों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि महिलाओं और अन्य हाशिए के जेंडर के अनुभवों और दृष्टिकोणों को या तो पूरी तरह से अनदेखा करते हैं या उन्हें गौण और अप्रासंगिक मानते हैं। ऐन टिकनर, रॉबर्ट केओहेन, जिल स्टीन्स और सैंड्रा व्हिटवर्थ जैसे प्रमुख नारीवादी विद्वानों के गहन कार्यों के माध्यम से इस नारीवादी चुनौती की जटिलताओं और महत्व को विस्तार से समझा जा सकता है।

  1. ज्ञानमीमांसीय और सत्तामीमांसीय आलोचना का विस्तार:
  • ऐन टिकनर (“You Just Don’t Understand: Troubled Engagements Between Feminists and IR Theorists”): टिकनर की आलोचना मुख्यधारा आईआर की अंतर्निहित ज्ञानमीमांसीय और सत्तामीमांसीय मान्यताओं पर केंद्रित है। वे तर्क देती हैं कि पारंपरिक आईआर ज्ञान के एक विशिष्ट रूप (तर्कसंगतता, वस्तुनिष्ठता, सार्वभौमिकता) को विशेषाधिकार देता है, जिसे ऐतिहासिक रूप से मर्दाना गुणों से जोड़ा गया है। इसके विपरीत, नारीवादी ज्ञानमीमांसा अनुभवजन्य ज्ञान, स्थानीय ज्ञान, व्यक्तिपरक अनुभवों और विभिन्न दृष्टिकोणों को महत्व देती है। टिकनर यह भी उजागर करती हैं कि मुख्यधारा सिद्धांत जिस दुनिया को समझते और विश्लेषित करते हैं (शक्ति-केंद्रित, स्वायत्त राज्यों का क्षेत्र, तर्कसंगत अभिनेताओं का खेल) वह स्वयं जेंडर-आधारित है और महिलाओं के अनुभवों के विपरीत है, जो अक्सर अंतर्संबंधितता, देखभाल, और निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के बीच धुंधली सीमाओं की विशेषता होती हैं। टिकनर का तर्क है कि इस सीमित दृष्टिकोण के कारण मुख्यधारा आईआर वैश्विक राजनीति की जटिलताओं और सूक्ष्मताओं को समझने में विफल रहता है।
  • जिल स्टीन्स (Gender and International Relations: An Introduction): स्टीन्स नारीवादी चुनौती को और आगे बढ़ाती हैं, यह तर्क देते हुए कि जेंडर केवल एक स्वतंत्र चर नहीं है जिसे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन में शामिल किया जा सकता है। बल्कि, जेंडर एक मूलभूत संरचनात्मक सिद्धांत है जो स्वयं आईआर के सिद्धांतों, अवधारणाओं और अनुसंधान एजेंडा को आकार देता है। स्टीन्स बताती हैं कि मुख्यधारा आईआर सिद्धांत अनजाने में एक ‘पुरुषवादी’ विश्वदृष्टि को कायम रखते हैं, जिसमें शक्ति, स्वायत्तता, सैन्य सुरक्षा और राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा जैसे मर्दाना मूल्यों पर अत्यधिक जोर दिया जाता है। वे तर्क देती हैं कि जेंडर को विश्लेषण के केंद्र में रखकर, हम अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की एक अधिक व्यापक और सटीक तस्वीर प्राप्त कर सकते हैं।
  1. अवधारणात्मक आलोचना का गहन विश्लेषण:
  • शक्ति की पुनर्कल्पना: नारीवादी विद्वान शक्ति की पारंपरिक, राज्य-केंद्रित और अक्सर सैन्य क्षमताओं से जुड़ी परिभाषा को मौलिक रूप से चुनौती देते हैं। टिकनर शक्ति की एक वैकल्पिक अवधारणा का प्रस्ताव करती हैं जो सहयोग, अंतर्संबंधितता, संचार और देखभाल जैसे पहलुओं को महत्व देती है, जिन्हें पारंपरिक रूप से ‘महिला’ गुणों के रूप में देखा जाता है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विभिन्न क्षेत्रों (जैसे कूटनीति, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, विकास) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार, नारीवादी दृष्टिकोण न केवल शक्ति के अभ्यास के बारे में हमारी समझ का विस्तार करता है बल्कि ‘शक्ति’ की स्वयं की परिभाषा को भी पुनर्परिभाषित करता है।
  • सुरक्षा का विस्तार: मुख्यधारा आईआर में सुरक्षा की संकीर्ण, राज्य-केंद्रित और सैन्य खतरों पर केंद्रित परिभाषा की नारीवादी विद्वानों द्वारा कड़ी आलोचना की गई है। टिकनर और स्टीन्स जैसे विद्वान ‘मानव सुरक्षा’ की अवधारणा पर जोर देते हैं, जो व्यक्तियों और समुदायों की सुरक्षा को प्राथमिकता देती है और इसमें आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरणीय और व्यक्तिगत सुरक्षा के साथ-साथ जेंडर-विशिष्ट असुरक्षाओं (जैसे घरेलू हिंसा, यौन हिंसा, मानव तस्करी) को भी शामिल करती है। नारीवादी विश्लेषण यह दर्शाता है कि महिलाओं और पुरुषों को वैश्विक राजनीति में अलग-अलग प्रकार की असुरक्षाओं का सामना करना पड़ता है और सुरक्षा की एक व्यापक और जेंडर-संवेदनशील समझ विकसित करना आवश्यक है।
  • राज्य की जेंडर-आधारित प्रकृति: मुख्यधारा आईआर में राज्य को अक्सर एक तटस्थ, तर्कसंगत और एकात्मक अभिनेता के रूप में माना जाता है। सैंड्रा व्हिटवर्थ इस धारणा को चुनौती देती हैं और तर्क देती हैं कि राज्य स्वयं जेंडर-आधारित है। पितृसत्तात्मक संरचनाएं, मानदंड और विचारधाराएं राज्य की संस्थाओं, नीतियों और शक्ति के वितरण में गहराई से अंतर्निहित हैं। व्हिटवर्थ का विश्लेषण दर्शाता है कि कैसे राज्य की नीतियां अनजाने में लैंगिक असमानताओं को कायम रख सकती हैं या उन्हें संबोधित कर सकती हैं, और यह कि राज्य के कार्यों को जेंडर के लेंस से समझने की आवश्यकता है।
  • तर्कसंगत अभिनेता मॉडल की जेंडर आलोचना: मुख्यधारा आईआर के कई सिद्धांत राज्यों को तर्कसंगत अभिनेता के रूप में मानते हैं जो स्व-हित को अधिकतम करने के लिए रणनीतिक निर्णय लेते हैं। नारीवादी विद्वान इस मॉडल की अंतर्निहित जेंडर-आधारित मान्यताओं पर सवाल उठाते हैं। वे तर्क देते हैं कि ‘तर्कसंगतता’ की अवधारणा स्वयं जेंडर-आधारित है और भावनाओं, देखभाल और अंतर्संबंधितता जैसे पहलुओं को नजरअंदाज करती है, जिन्हें पारंपरिक रूप से महिलाओं से जोड़ा जाता है लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। नारीवादी विश्लेषण यह दर्शाता है कि जेंडर भूमिकाएं और अपेक्षाएं राज्यों और अन्य अंतर्राष्ट्रीय अभिनेताओं के निर्णय लेने के तरीकों को प्रभावित कर सकती हैं।
  1. पद्धतिगत आलोचना में सूक्ष्मता:
  • रॉबर्ट केओहेन (“Beyond Dichotomy: Conversations between International Relations and Feminist Theory”): केओहेन नारीवादी सिद्धांत के साथ एक गंभीर और रचनात्मक संवाद की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं। वे चेतावनी देते हैं कि नारीवादी अंतर्दृष्टि को केवल मुख्यधारा आईआर में ‘जोड़ने’ से पर्याप्त परिवर्तन नहीं आएगा। इसके बजाय, वे पारंपरिक रूप से जेंडर-आधारित द्विभाजनों (जैसे तर्कसंगत/भावनात्मक, सार्वजनिक/निजी, शक्ति/नैतिकता) को चुनौती देने और पार करने के महत्व पर जोर देते हैं जिन्होंने आईआर विश्लेषण को सीमित किया है। केओहेन का तर्क है कि नारीवादी सिद्धांत आईआर विद्वानों को दुनिया को देखने और विश्लेषण करने के नए तरीके प्रदान कर सकता है, जिससे एक अधिक समृद्ध और व्यापक समझ पैदा हो सकती है।

निष्कर्ष:

नारीवादी विद्वानों द्वारा मुख्यधारा/पुरुषधारा आईआर सिद्धांतों को दी गई चुनौती एक मौलिक और परिवर्तनकारी हस्तक्षेप है। उन्होंने न केवल अनुशासन की अंतर्निहित मान्यताओं और अवधारणाओं पर सवाल उठाया है, बल्कि विश्लेषण के नए तरीके और विषय भी पेश किए हैं। शक्ति, सुरक्षा और राज्य जैसी केंद्रीय अवधारणाओं का पुनर्मूल्यांकन करके और जेंडर को विश्लेषण के केंद्र में रखकर, नारीवादी विद्वानों ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन को अधिक समावेशी, जटिल और वैश्विक राजनीति की बहुआयामी वास्तविकताओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाया है। यह चुनौती आईआर विद्वानों को दुनिया को देखने और समझने के अपने पारंपरिक तरीकों पर पुनर्विचार करने और एक अधिक न्यायसंगत और शांतिपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करती है।

 

सैद्धांतिक योगदान: पुरुषत्व और हेजेमोनिक पुरुषत्व

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (आईआर) के अध्ययन में, नारीवादी विद्वानों ने सिर्फ महिलाओं के अनुभवों को ही शामिल करने पर जोर नहीं दिया है, बल्कि उन्होंने ‘पुरुषत्व’ (masculinity) की अवधारणा का भी गहराई से विश्लेषण किया है। उनका मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, जो ऐतिहासिक रूप से पुरुषों का क्षेत्र रही है, ‘मर्दाना’ गुणों और आदर्शों से गहराई से प्रभावित है। इस संदर्भ में, ‘हेजेमोनिक पुरुषत्व’ (hegemonic masculinity) की अवधारणा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऐन टिकनर और सी. मैन्ली हूपर जैसे विद्वानों ने इस अवधारणा को आईआर को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया है।

पुरुषत्व क्या है?

सरल शब्दों में, पुरुषत्व उन सामाजिक रूप से निर्मित गुणों, व्यवहारों और भूमिकाओं को संदर्भित करता है जो एक विशेष समाज पुरुषों के लिए ‘सामान्य’ या ‘आदर्श’ मानता है। यह जैविक लिंग (पुरुष होना) से अलग है। अलग-अलग संस्कृतियों और समय अवधियों में पुरुषत्व के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं।

हेजेमोनिक पुरुषत्व क्या है?

सी. मैन्ली हूपर अपनी पुस्तक “मैनली स्टेट्स: मैस्कुलिनिटीज, इंटरनेशनल रिलेशंस एंड जेंडर पॉलिटिक्स” में ‘हेजेमोनिक पुरुषत्व’ की अवधारणा को विस्तार से समझाती हैं। यह शब्द उस सांस्कृतिक रूप से प्रभावी या ‘आदर्श’ प्रकार के पुरुषत्व को दर्शाता है जो एक विशेष समाज में अन्य प्रकार के पुरुषत्व (जैसे अधीनस्थ या हाशिए पर रहने वाले पुरुषत्व) पर हावी रहता है।

हेजेमोनिक पुरुषत्व कुछ विशिष्ट गुणों से जुड़ी होती है, जैसे:

  • कठोरता (Toughness): भावनात्मक रूप से मजबूत और कमजोरियों को न दिखाना।
  • स्वतंत्रता (Independence): आत्मनिर्भर होना और दूसरों पर निर्भर न रहना।
  • शक्ति (Power): दूसरों पर नियंत्रण रखने और प्रभुत्व स्थापित करने की क्षमता।
  • तर्कसंगतता (Rationality): भावनाओं के बजाय तर्क और बुद्धि से निर्णय लेना।
  • शारीरिक शक्ति और हिंसा का उपयोग करने की क्षमता: खासकर अपने देश की रक्षा के नाम पर।

आईआर के लिए हेजेमोनिक पुरुषत्व का महत्व:

टिकनर और हूपर जैसे विद्वान तर्क देते हैं कि हेजेमोनिक पुरुषत्व अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को कई तरह से प्रभावित करती है:

  • शक्ति की अवधारणा: अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति को अक्सर सैन्य क्षमता और राज्यों की स्वायत्तता के संदर्भ में समझा जाता है। ये अवधारणाएं पारंपरिक रूप से मर्दाना गुणों से जुड़ी हुई हैं। हेजेमोनिक पुरुषत्व शक्ति को प्रभुत्व और नियंत्रण के रूप में देखने के तरीके को मजबूत करती है।
  • सुरक्षा की प्राथमिकताएं: राष्ट्रीय सुरक्षा की पारंपरिक चिंताएं अक्सर सैन्य शक्ति और खतरों पर केंद्रित होती हैं। यह जोर हेजेमोनिक पुरुषत्व के उन पहलुओं को दर्शाता है जो ताकत और हिंसा को महत्व देते हैं। महिलाओं और अन्य हाशिए के समूहों की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
  • कूटनीति और निर्णय लेना: अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति और विदेश नीति निर्माण के क्षेत्र में ऐतिहासिक रूप से पुरुषों का प्रभुत्व रहा है। निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में हेजेमोनिक पुरुषत्व के आदर्श (जैसे भावनाओं पर तर्क का प्रभुत्व) हावी हो सकते हैं, जिससे अन्य दृष्टिकोणों को नजरअंदाज किया जा सकता है।
  • राष्ट्रवाद: राष्ट्रवाद अक्सर मर्दाना गुणों (जैसे बहादुरी, बलिदान) से जुड़ा होता है और ‘मर्दाना राष्ट्र’ की छवि को बढ़ावा देता है जिसे बाहरी खतरों से बचाने की आवश्यकता होती है। महिलाओं को अक्सर राष्ट्र के प्रतीकात्मक वाहक के रूप में चित्रित किया जाता है।
  • युद्ध और संघर्ष: हेजेमोनिक पुरुषत्व हिंसा के उपयोग को, खासकर राष्ट्रीय हितों की रक्षा के नाम पर, महिमामंडित कर सकती है। ‘पुरुष योद्धा’ का आदर्श संघर्षों को वैध ठहराने और बनाए रखने में भूमिका निभा सकता है।

निष्कर्ष:

टिकनर और हूपर का काम यह दर्शाता है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को समझने के लिए न केवल जेंडर को एक विश्लेषणात्मक श्रेणी के रूप में शामिल करना महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी समझना आवश्यक है कि ‘पुरुषत्व’ की सामाजिक रचना, विशेष रूप से हेजेमोनिक पुरुषत्व के आदर्श, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की संरचनाओं, प्रक्रियाओं और परिणामों को कैसे आकार देते हैं। हेजेमोनिक पुरुषत्व की आलोचना करके, नारीवादी विद्वान शक्ति, सुरक्षा और संघर्ष की हमारी पारंपरिक समझ को चुनौती देते हैं और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए एक अधिक समावेशी और व्यापक दृष्टिकोण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

 

क्वीर सिद्धांत और आईआर

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (आईआर) के अध्ययन में, नारीवादी दृष्टिकोण के साथ-साथ ‘क्वीर सिद्धांत’ (Queer theory) ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। क्वीर सिद्धांत पारंपरिक जेंडर (स्त्री/पुरुष) और कामुकता (समलैंगिक/विषमलिंगी) की निश्चित श्रेणियों को चुनौती देता है। यह मानता है कि जेंडर और कामुकता सामाजिक रूप से निर्मित होते हैं और स्थिर या ‘प्राकृतिक’ नहीं होते। मेलानी रिक्टर-मोंटपिट, जसबीर के. पुआर और सिंथिया वेबर जैसे विद्वानों ने क्वीर सिद्धांत के विचारों को आईआर के अध्ययन में शामिल किया है।

क्वीर सिद्धांत क्या कहता है?

सीधे शब्दों में कहें तो, क्वीर सिद्धांत निम्नलिखित बातों पर जोर देता है:

  • जेंडर और कामुकता की तरलता: यह मानता है कि जेंडर पहचान (जैसे पुरुष, महिला, ट्रांसजेंडर) और यौन रुझान (जैसे समलैंगिक, विषमलिंगी, उभयलिंगी) स्थिर नहीं होते और समय के साथ बदल सकते हैं।
  • द्विआधारी विरोधों की आलोचना: यह जेंडर (स्त्री/पुरुष) और कामुकता (समलैंगिक/विषमलिंगी) जैसी दो स्पष्ट और विपरीत श्रेणियों में दुनिया को देखने के तरीके की आलोचना करता है। यह इन श्रेणियों के बीच मौजूद जटिलताओं और विविधताओं पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • सामाजिक निर्माण: क्वीर सिद्धांत जोर देता है कि जेंडर और कामुकता जैविक रूप से निर्धारित नहीं होते, बल्कि सामाजिक नियमों, सांस्कृतिक प्रथाओं और भाषा के माध्यम से बनाए जाते हैं।
  • असामान्य और हाशिए पर स्थित: यह उन लोगों के अनुभवों और दृष्टिकोणों पर ध्यान केंद्रित करता है जो जेंडर और कामुकता की मुख्यधारा की अपेक्षाओं से अलग हैं।

आईआर के लिए क्वीर सिद्धांत का महत्व:

रिक्टर-मोंटपिट, पुआर और वेबर जैसे विद्वानों ने क्वीर सिद्धांत के विचारों को आईआर के अध्ययन में शामिल करके कई महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान की हैं:

  • जेंडर और कामुकता का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से संबंध: क्वीर सिद्धांत यह समझने में मदद करता है कि जेंडर और कामुकता केवल ‘निजी’ मामले नहीं हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, शक्ति संरचनाओं और पहचानों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • होमोनेशनलिज्म की आलोचना (पुआर): जसबीर पुआर ‘होमोनेशनलिज्म’ की अवधारणा का विश्लेषण करती हैं। यह उस प्रक्रिया को संदर्भित करता है जिसमें पश्चिमी देश एलजीबीटीक्यू+ अधिकारों की प्रगतिशील छवि का उपयोग खुद को ‘आधुनिक’ और ‘सभ्य’ दिखाने के लिए करते हैं, जबकि अन्य देशों को ‘पिछड़ा’ और ‘असहिष्णु’ के रूप में चित्रित करते हैं। इसका उपयोग अक्सर हस्तक्षेप और राजनीतिक उद्देश्यों को सही ठहराने के लिए किया जाता है। क्वीर सिद्धांत इस तरह के उपयोग की आलोचना करता है और दिखाता है कि कैसे एलजीबीटीक्यू+ अधिकारों को भू-राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों को चुनौती (वेबर): सिंथिया वेबर तर्क देती हैं कि क्वीर सिद्धांत आईआर के पारंपरिक मानदंडों और मान्यताओं पर सवाल उठाने का एक तरीका प्रदान करता है। ‘क्वीर बौद्धिक जिज्ञासा’ को एक विधि के रूप में अपनाकर, हम उन मान्यताओं को उजागर कर सकते हैं जो अक्सर अनदेखी कर दी जाती हैं और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की हमारी समझ को सीमित करती हैं।
  • सुरक्षा और पहचान का पुनर्विश्लेषण (रिक्टर-मोंटपिट): रिक्टर-मोंटपिट यह दर्शाती हैं कि क्वीर सिद्धांत हमें सुरक्षा और पहचान की पारंपरिक अवधारणाओं पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है। जेंडर और कामुकता की तरल प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, हम यह समझ सकते हैं कि असुरक्षा और पहचान के अनुभव अलग-अलग लोगों और समूहों के लिए कितने विविध हो सकते हैं।

निष्कर्ष:

क्वीर सिद्धांत आईआर के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है। यह जेंडर और कामुकता की पारंपरिक श्रेणियों को चुनौती देकर और हाशिए पर स्थित लोगों के अनुभवों पर ध्यान केंद्रित करके अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की हमारी समझ को व्यापक और गहरा बनाता है। पुआर के होमोनेशनलिज्म के विश्लेषण और वेबर के ‘क्वीर बौद्धिक जिज्ञासा’ के विचार जैसे योगदान यह दर्शाते हैं कि कैसे क्वीर सिद्धांत आईआर के महत्वपूर्ण मुद्दों पर नए और महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है। यह हमें अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की जटिलताओं को समझने के लिए एक और महत्वपूर्ण लेंस प्रदान करता है।

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