Unit – 4

UNIT IV

आईआर व्यवहार का जेंडरीकरण – परिचय (Gendering IR Practices – Introduction)

अब तक हमने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (आईआर) के अध्ययन में जेंडर के सैद्धांतिक और वैचारिक योगदानों पर विचार किया। इस खंड में, हम यह देखेंगे कि जेंडर वास्तव में आईआर के व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है – यानी, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की वास्तविक दुनिया में नीतियां कैसे बनती हैं, संस्थान कैसे काम करते हैं, और युद्ध व संघर्ष कैसे होते हैं। ‘आईआर व्यवहार का जेंडरीकरण’ इस बात की पड़ताल करता है कि जेंडर के लेंस से देखने पर इन पारंपरिक रूप से ‘उच्च राजनीति’ के क्षेत्रों में क्या नई अंतर्दृष्टियाँ मिलती हैं।

हम निम्नलिखित महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जेंडर के प्रभाव का विश्लेषण करेंगे:

क. जेंडर और विदेश नीति (Gender and Foreign Policy):

  • क्या विदेश नीति का निर्माण और कार्यान्वयन जेंडर से अप्रभावित रहता है?
  • क्या महिला नेताओं की विदेश नीति पुरुषों से अलग होती है?
  • विदेश नीति के एजेंडे में जेंडर संबंधी मुद्दों को कितना महत्व दिया जाता है?
  • हम देखेंगे कि कैसे जेंडर मानदंड और अपेक्षाएं विदेश नीति के लक्ष्यों, प्राथमिकताओं और उपकरणों को प्रभावित कर सकती हैं।

ख. जेंडर और अंतर्राष्ट्रीय संस्थान (Gender and International Institutions):

  • संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की संरचना और कामकाज में जेंडर की क्या भूमिका है?
  • इन संस्थानों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कितना है और इसका नीतियों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
  • क्या ये संस्थान लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी कदम उठा रहे हैं या अनजाने में लैंगिक असमानताओं को कायम रख रहे हैं?
  • हम जांच करेंगे कि कैसे जेंडर अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की वैधता, प्रभावशीलता और नीतियों को आकार देता है।

ग. जेंडर, युद्ध और संघर्ष (Gender, War and Conflicts):

  • युद्ध और संघर्ष महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग तरीकों से कैसे प्रभावित करते हैं?
  • संघर्षों में महिलाओं की भूमिकाएँ क्या हैं – क्या वे केवल पीड़ित हैं या सक्रिय भागीदार भी हैं?
  • यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के रूप में क्यों इस्तेमाल किया जाता है और इसके क्या निहितार्थ हैं?
  • शांति निर्माण और संघर्ष समाधान की प्रक्रियाओं में जेंडर का क्या महत्व है?
  • हम देखेंगे कि कैसे जेंडर युद्ध और संघर्ष के कारणों, गतिशीलता और परिणामों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण लेंस प्रदान करता है।

इन क्षेत्रों का अध्ययन करके, हम यह समझ पाएंगे कि जेंडर केवल एक ‘सामाजिक’ मुद्दा नहीं है, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं को गहराई से प्रभावित करता है। ‘आईआर व्यवहार का जेंडरीकरण’ हमें वैश्विक चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से विश्लेषण करने और अधिक न्यायसंगत और समावेशी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की दिशा में काम करने के लिए आवश्यक व्यावहारिक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

 

जेंडर और विदेश नीति

परिचय

‘जेंडर और विदेश नीति’ का अध्ययन इस बात की पड़ताल करता है कि जेंडर मानदंड, भूमिकाएँ, अपेक्षाएँ और शक्ति संरचनाएँ राज्यों द्वारा अपनाई जाने वाली विदेश नीतियों के निर्माण, कार्यान्वयन और परिणामों को कैसे प्रभावित करती हैं। पारंपरिक रूप से, विदेश नीति को ‘उच्च राजनीति’ का क्षेत्र माना जाता रहा है, जिसमें मुख्य रूप से राज्यों के बीच शक्ति संबंधों, सुरक्षा और आर्थिक हितों पर ध्यान केंद्रित किया जाता था, और जेंडर के पहलुओं को अक्सर अप्रासंगिक माना जाता था। हालांकि, नारीवादी और जेंडर विद्वानों ने यह तर्क दिया है कि जेंडर विदेश नीति को समझने का एक महत्वपूर्ण लेंस प्रदान करता है और यह राज्यों के लक्ष्यों, प्राथमिकताओं और अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार को आकार देता है।

विक्टोरिया शेयेर , मरीना कुम्स्कोवा, और स्वर्णा राजगोपालन जैसे विद्वानों ने ‘जेंडर’ के नजरिए से विदेश नीति के निर्माण और कार्यान्वयन का विश्लेषण किया है। उनका काम यह दर्शाता है कि विदेश नीति जेंडर मानदंडों और अपेक्षाओं से किस प्रकार प्रभावित होती है, और ‘महिलाओं को जोड़ने’ मात्र से ‘नारीवादी एजेंडा’ को आगे बढ़ाना कितना अलग है।

विक्टोरिया शेयेर और मरीना कुम्स्कोवा:

अपने लेख “फेमिनिस्ट फॉरेन पॉलिसी: ए फाइन लाइन बिटवीन ‘एडिंग वुमेन’ एंड पर्सुइंग ए फेमिनिस्ट एजेंडा” में शेयेर और कुम्स्कोवा ‘नारीवादी विदेश नीति’ (Feminist Foreign Policy – FFP) की अवधारणा की पड़ताल करती हैं। उनका मुख्य तर्क यह है कि विदेश नीति में महिलाओं की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करना (महिलाओं को ‘जोड़ना’) अपने आप में नारीवादी विदेश नीति नहीं है। असली नारीवादी विदेश नीति का लक्ष्य लैंगिक समानता को बढ़ावा देना और सभी प्रकार के लिंग आधारित भेदभाव और असमानता को समाप्त करना है।

  • महिलाओं को जोड़ना’ बनाम नारीवादी एजेंडा: शेयेर और कुम्स्कोवा स्पष्ट करती हैं कि विदेश मंत्रालय या अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में अधिक महिलाओं को नियुक्त करना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह स्वतः ही नारीवादी विदेश नीति नहीं बन जाती। यदि ये महिलाएं मौजूदा पुरुष-प्रधान व्यवस्था और उसकी प्राथमिकताओं के भीतर ही काम करती हैं, तो वे संरचनात्मक बदलाव लाने में विफल रह सकती हैं।
  • नारीवादी विदेश नीति के सिद्धांत: एक सच्ची नारीवादी विदेश नीति में निम्नलिखित सिद्धांत शामिल होने चाहिए:
    • लैंगिक समानता पर स्पष्ट ध्यान: सभी विदेश नीतिगत निर्णयों और कार्यों में लैंगिक समानता को एक केंद्रीय लक्ष्य के रूप में शामिल करना।
    • महिलाओं और हाशिए के समूहों के अधिकारों को प्राथमिकता देना: विदेश नीति को महिलाओं, लड़कियों और अन्य लिंग आधारित भेदभाव का सामना करने वाले समूहों के अधिकारों की रक्षा और संवर्धन पर केंद्रित होना चाहिए।
    • असुरक्षा के जेंडर आयामों को संबोधित करना: संघर्ष, गरीबी और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों के लिंग-विशिष्ट प्रभावों को समझना और उनका समाधान करना।
    • पितृसत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती देना: उन वैश्विक और स्थानीय शक्ति संरचनाओं को चुनौती देना जो लैंगिक असमानता को कायम रखती हैं।
    • समावेशी और सहभागी दृष्टिकोण: विदेश नीति के निर्माण और कार्यान्वयन में महिलाओं और हाशिए के समूहों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • उदाहरण: शेयेर और कुम्स्कोवा कुछ देशों की विदेश नीतियों का विश्लेषण करती हैं जो खुद को नारीवादी बताती हैं और दिखाती हैं कि कैसे कुछ ‘महिलाओं को जोड़ने’ पर अधिक ध्यान केंद्रित करती हैं जबकि अन्य अधिक व्यापक नारीवादी एजेंडा को आगे बढ़ाने का प्रयास करती हैं।

स्वर्णा राजगोपालन:

अपने लेख “रिफ्लेक्शंस ऑन फेमिनिज्म एंड फॉरेन पॉलिसी” में स्वर्णा राजगोपालन नारीवादी सिद्धांतों और विदेश नीति के बीच संबंधों पर विचार करती हैं, विशेष रूप से भारतीय संदर्भ में।

  • नारीवादी सिद्धांतों की प्रासंगिकता: राजगोपालन तर्क देती हैं कि नारीवादी सिद्धांत विदेश नीति के विश्लेषण और निर्माण के लिए महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। यह हमें शक्ति, असमानता और हिंसा के जेंडर आयामों को समझने में मदद करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को आकार देते हैं।
  • भारतीय विदेश नीति में जेंडर: राजगोपालन भारतीय विदेश नीति में जेंडर के मुद्दों की उपस्थिति और अनुपस्थिति की पड़ताल करती हैं। वह दिखाती हैं कि कुछ क्षेत्रों (जैसे महिलाओं का सशक्तिकरण) पर ध्यान दिया गया है, लेकिन विदेश नीति के व्यापक ढांचे में जेंडर परिप्रेक्ष्य को पूरी तरह से एकीकृत करने की आवश्यकता है।
  • चुनौतियां और अवसर: राजगोपालन नारीवादी विदेश नीति को लागू करने में आने वाली चुनौतियों (जैसे पारंपरिक सोच, नौकरशाही प्रतिरोध) और अवसरों (जैसे वैश्विक स्तर पर बढ़ती जागरूकता) पर विचार करती हैं। वह तर्क देती हैं कि भारत के पास एक ऐसी विदेश नीति विकसित करने का अवसर है जो लैंगिक समानता को बढ़ावा दे और वैश्विक स्तर पर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करे।

निष्कर्ष:

शेयेर, कुम्स्कोवा और राजगोपालन का काम यह स्पष्ट करता है कि विदेश नीति का जेंडरीकरण केवल महिलाओं को निर्णय लेने की मेज पर लाने से कहीं अधिक है। इसके लिए एक व्यापक नारीवादी एजेंडा की आवश्यकता है जो लैंगिक समानता को केंद्रीय लक्ष्य के रूप में स्थापित करे, महिलाओं और हाशिए के समूहों के अधिकारों को प्राथमिकता दे, असुरक्षा के जेंडर आयामों को संबोधित करे और पितृसत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती दे। नारीवादी सिद्धांतों को विदेश नीति में एकीकृत करके, देश अधिक न्यायसंगत, समावेशी और प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय संबंध बना सकते हैं।

 

जेंडर और अंतर्राष्ट्रीय संस्थान

अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, जैसे संयुक्त राष्ट्र (यूएन), विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विभिन्न क्षेत्रीय संगठन, वैश्विक शासन और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये संस्थान नियम, मानदंड और नीतियां बनाते हैं जो राज्यों, व्यक्तियों और समाजों के बीच बातचीत को प्रभावित करते हैं। ‘जेंडर और अंतर्राष्ट्रीय संस्थान’ का अध्ययन इस बात की पड़ताल करता है कि जेंडर इन संस्थानों की संरचना, कामकाज और प्रभाव को कैसे प्रभावित करता है, और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका और सीमाएं क्या हैं।

मार्गरेट स्नाइडर और लौरा जे. शेफर्ड जैसे विद्वानों ने ‘जेंडर’ के नजरिए से अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों (जैसे संयुक्त राष्ट्र) की भूमिका, कामकाज और प्रभाव का विश्लेषण किया है। उनका काम यह दर्शाता है कि कैसे जेंडर इन संस्थानों की संरचना, नीतियों और शक्ति गतिशीलता को प्रभावित करता है, और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में उनकी सफलताएं और सीमाएं क्या हैं।

मार्गरेट स्नाइडर: संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक महिला आंदोलन

अपने अध्याय “अनलाइकली गॉडमदर: द यूएन एंड द ग्लोबल वूमेन्स मूवमेंट” में मार्गरेट स्नाइडर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और वैश्विक महिला आंदोलन के बीच जटिल और अप्रत्याशित संबंधों की पड़ताल करती हैं।

  • यूएन की भूमिका: स्नाइडर बताती हैं कि कैसे यूएन, अपनी शुरुआती सीमाओं के बावजूद, धीरे-धीरे वैश्विक महिला आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण मंच और उत्प्रेरक बन गया। इसने महिलाओं के मुद्दों को अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे पर लाने, वैश्विक सम्मेलनों का आयोजन करने और लैंगिक समानता के लिए मानदंड स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • महिला आंदोलन का प्रभाव: स्नाइडर यह भी दर्शाती हैं कि कैसे वैश्विक महिला आंदोलन ने यूएन को लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए लगातार दबाव डाला। महिलाओं के संगठनों और कार्यकर्ताओं ने यूएन की नीतियों और कार्यक्रमों को प्रभावित करने, नए मानकों की वकालत करने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अथक प्रयास किया है।
  • सीमाएं और विरोधाभास: स्नाइडर यूएन की सीमाओं और विरोधाभासों को भी उजागर करती हैं। वह बताती हैं कि कैसे सदस्य राज्यों के निहित स्वार्थ, नौकरशाही जड़ता और शक्ति की राजनीति अक्सर लैंगिक समानता के एजेंडे को कमजोर कर सकती है। इसके अलावा, यूएन की नीतियों का कार्यान्वयन अक्सर असमान और असंगत रहा है।

लौरा जे. शेफर्ड:

शेफर्ड अपने विभिन्न कार्यों में, विशेष रूप से “सेक्स, सिक्योरिटी एंड सुपरहीरो(इन)एस: फ्रॉम 1325 टू 1820 एंड बियॉन्ड” और “पावर एंड अथॉरिटी इन द प्रोडक्शन ऑफ यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल रेजोल्यूशन 1325” में, अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में जेंडर की भूमिका का गहन विश्लेषण करती हैं।

  • संकल्प 1325: शेफर्ड यूएनएससी के ऐतिहासिक संकल्प 1325 का विस्तृत अध्ययन करती हैं, जो संघर्ष और शांति प्रक्रियाओं में महिलाओं की भूमिका को मान्यता देता है। वह दिखाती हैं कि इस संकल्प का निर्माण, पाठ और कार्यान्वयन जटिल शक्ति गतिशीलता और जेंडर मानदंडों से कैसे प्रभावित था। जबकि यह एक महत्वपूर्ण कदम था, शेफर्ड इसकी सीमाओं और कार्यान्वयन में चुनौतियों पर भी प्रकाश डालती हैं।
  • शक्ति और अधिकार: शेफर्ड तर्क देती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में शक्ति और अधिकार का उत्पादन जेंडर-आधारित होता है। निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में महिलाओं की कम भागीदारी, मर्दाना मानदंडों का प्रभुत्व और सुरक्षा की पारंपरिक अवधारणाएं अक्सर लैंगिक समानता के एजेंडे को हाशिए पर रखती हैं।
  • सुपरहीरो’ की आलोचना: “सेक्स, सिक्योरिटी एंड सुपरहीरो(इन)एस” में शेफर्ड ‘अंतर्राष्ट्रीय समुदाय’ की ‘सुपरहीरो’ जैसी छवि की आलोचना करती हैं जो संकटग्रस्त महिलाओं को बचाने के लिए आता है। वह तर्क देती हैं कि यह चित्रण महिलाओं को निष्क्रिय पीड़ितों के रूप में प्रस्तुत करता है और उनकी एजेंसी और प्रतिरोध की क्षमता को अनदेखा करता है। यह अक्सर हस्तक्षेप को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन स्थानीय महिलाओं की वास्तविक जरूरतों और अनुभवों को संबोधित करने में विफल रहता है।

निष्कर्ष:

स्नाइडर और शेफर्ड का काम यह दर्शाता है कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थान लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण मंच हो सकते हैं, लेकिन वे जेंडर शक्ति गतिशीलता और राजनीतिक बाधाओं से भी मुक्त नहीं हैं। वैश्विक महिला आंदोलन ने यूएन को लैंगिक समानता के मुद्दों पर ध्यान देने के लिए महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है, लेकिन इन संस्थानों की संरचना और कामकाज में निहित जेंडर पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए निरंतर प्रयास की आवश्यकता है। यूएनएससी संकल्प 1325 एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, लेकिन इसका प्रभावी कार्यान्वयन अभी भी एक चुनौती है। अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों का जेंडरीकरण करने के लिए, हमें उनकी संरचनाओं, नीतियों और शक्ति गतिशीलता का आलोचनात्मक विश्लेषण करना होगा और लैंगिक समानता और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को प्राथमिकता देनी होगी।

 

 

जेंडर, युद्ध और संघर्ष

परिचय

युद्ध और संघर्ष मानव इतिहास का एक अभिन्न अंग रहे हैं, लेकिन पारंपरिक विश्लेषण अक्सर इन्हें मुख्य रूप से पुरुषों के क्षेत्र और राज्यों के बीच शक्ति संघर्ष के रूप में देखते रहे हैं। हालांकि, नारीवादी और जेंडर विद्वानों ने इस दृष्टिकोण को चुनौती दी है और यह दर्शाया है कि जेंडर युद्ध और संघर्षों को समझने का एक महत्वपूर्ण लेंस प्रदान करता है। ‘जेंडर, युद्ध और संघर्ष’ के अध्ययन का उद्देश्य यह पड़ताल करना है कि कैसे जेंडर मानदंड, भूमिकाएँ और शक्ति संरचनाएँ युद्धों के कारणों, गतिशीलता और परिणामों को आकार देती हैं, और यह महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग तरीकों से कैसे प्रभावित करता है।

लौरा स्जोबर्ग, सैंड्रा विया, मेगन गेरेके, कैरोन ई. जेंट्री, मेगन एच. मैकेंजी और आर. चार्ली कारपेंटर जैसे विद्वानों ने ‘जेंडर’ के नजरिए से युद्ध और संघर्षों का गहन विश्लेषण किया है। उनका काम यह दर्शाता है कि युद्ध और संघर्ष केवल पुरुषों के बीच की लड़ाई नहीं हैं, बल्कि ये जेंडर मानदंडों, शक्ति संरचनाओं और यौन हिंसा से गहराई से जुड़े हुए हैं, और महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करते हैं।

लौरा स्जोबर्ग और सैंड्रा विया:

अपनी पुस्तक “जेंडर वॉर एंड मिलिटरिज्म: फेमिनिस्ट पर्सपेक्टिव्स” में स्जोबर्ग और विया युद्ध और सैन्यवाद के जेंडर आयामों की व्यापक पड़ताल करती हैं।

  • युद्ध का जेंडरीकरण: वे तर्क देती हैं कि युद्ध केवल सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह जेंडर भूमिकाओं, मर्दाना आदर्शों और यौन हिंसा से गहराई से जुड़ा हुआ है। युद्ध अक्सर मर्दाना गुणों (जैसे आक्रामकता, बहादुरी) को बढ़ावा देता है और महिलाओं को गैर-लड़ाकू भूमिकाओं तक सीमित कर देता है, भले ही वे संघर्षों में सक्रिय रूप से शामिल हों।
  • सैन्यवाद का जेंडर आधार: स्जोबर्ग और विया यह भी विश्लेषण करती हैं कि सैन्यवाद किस प्रकार जेंडर मानदंडों और शक्ति संरचनाओं पर आधारित है। सैन्य संस्थान अक्सर मर्दाना संस्कृति को बढ़ावा देते हैं और महिलाओं को अधीनस्थ भूमिकाओं में रखते हैं।
  • महिलाओं की बहुआयामी भूमिकाएँ: वे इस बात पर जोर देती हैं कि संघर्षों में महिलाओं की भूमिकाएँ केवल पीड़ित होने तक सीमित नहीं हैं। महिलाएं लड़ाकों, जासूसों, रसद प्रदाताओं और शांति कार्यकर्ताओं के रूप में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, लेकिन उनकी इन भूमिकाओं को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

मेगन गेरेके: संघर्ष स्थितियों में यौन हिंसा की व्याख्या

गेरेके अपने अध्याय “एक्सप्लेनिंग सेक्सुअल वायलेंस इन कॉन्फ्लिक्ट सिचुएशंस” में संघर्ष क्षेत्रों में यौन हिंसा के कारणों और गतिशीलता का विश्लेषण करती हैं।

  • यौन हिंसा एक हथियार के रूप में: गेरेके तर्क देती हैं कि संघर्ष में यौन हिंसा केवल ‘युद्ध का उपोत्पाद’ नहीं है, बल्कि इसे अक्सर रणनीतिक रूप से आबादी को आतंकित करने, दुश्मन को नीचा दिखाने और जातीय सफाई करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
  • शक्ति और प्रभुत्व का प्रदर्शन: यौन हिंसा हमलावरों के लिए शक्ति और प्रभुत्व का प्रदर्शन करने का एक तरीका हो सकता है, जो जेंडर शक्ति असमानताओं को दर्शाता है।
  • पीड़ितों का जेंडरीकरण: यौन हिंसा का शिकार अक्सर महिलाएं और लड़कियां होती हैं, लेकिन गेरेके यह भी स्वीकार करती हैं कि पुरुष और लड़के भी यौन हिंसा का शिकार हो सकते हैं, हालांकि इसे अक्सर कम रिपोर्ट किया जाता है और अनदेखा किया जाता है।

लौरा स्जोबर्ग और कैरोन ई. जेंट्री: हिंसक महिलाओं की कथाएँ

स्जोबर्ग और जेंट्री अपने लेख “रिड्यूस्ड टू बैड सेक्स: नैरेटिव्स ऑफ वायलेंट वुमेन फ्रॉम द बाइबल टू द वॉर ऑन टेरर” में हिंसक महिलाओं के चित्रण का विश्लेषण करती हैं।

  • महिलाओं की हिंसा का असामान्य चित्रण: वे तर्क देती हैं कि जब महिलाएं हिंसा करती हैं, तो उन्हें अक्सर असामान्य, राक्षसी या यौन रूप से विकृत के रूप में चित्रित किया जाता है। यह चित्रण महिलाओं को हिंसा करने में सक्षम राजनीतिक अभिनेताओं के रूप में समझने में बाधा डालता है।
  • जेंडर पूर्वाग्रह: यह विश्लेषण दर्शाता है कि कैसे जेंडर पूर्वाग्रह महिलाओं की हिंसा की हमारी समझ को विकृत करता है और उन्हें पुरुषों की तरह राजनीतिक उद्देश्यों के लिए हिंसा करने में सक्षम नहीं मानता है।

मेगन एच. मैकेंजी: युद्ध में महिलाएं – ‘क्या वे कर सकती हैं?’ या ‘क्या उन्हें करना चाहिए?’ से परे

मैकेंजी अपने परिचय “वुमेन इन कॉम्बैट: बियॉन्ड ‘कैन दे?’ ऑर ‘शुड दे?'” में युद्ध में महिलाओं की भागीदारी पर पारंपरिक बहसों को चुनौती देती हैं।

  • क्षमता और नैतिकता से परे: वह तर्क देती हैं कि बहस केवल इस बात पर केंद्रित नहीं होनी चाहिए कि क्या महिलाएं युद्ध में शारीरिक रूप से सक्षम हैं या क्या युद्ध में उनकी भागीदारी नैतिक रूप से सही है।
  • समावेश और प्रतिनिधित्व का मुद्दा: मैकेंजी जोर देती हैं कि युद्ध में महिलाओं की भागीदारी समावेश, समानता और नागरिकता के अधिकारों का मामला है। महिलाओं को सैन्य और सुरक्षा क्षेत्रों में समान अवसर मिलने चाहिए।

आर. चार्ली कारपेंटर: संघर्ष स्थितियों में नागरिक पुरुषों और लड़कों के खिलाफ जेंडर-आधारित हिंसा को पहचानना

कारपेंटर अपने लेख “रिकॉग्नाइजिंग जेंडर-बेस्ड वायलेंस अगेंस्ट सिविलियन मेन एंड बॉयज इन कॉन्फ्लिक्ट सिचुएशंस” में एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखे पहलू पर ध्यान केंद्रित करते हैं: संघर्ष में नागरिक पुरुषों और लड़कों के खिलाफ जेंडर-आधारित हिंसा।

  • पुरुषों और लड़कों की भेद्यता: कारपेंटर तर्क देते हैं कि संघर्ष में पुरुष और लड़के भी यौन हिंसा, जबरन भर्ती और अन्य प्रकार की जेंडर-आधारित हिंसा के शिकार हो सकते हैं।
  • मर्दाना मानदंडों की चुनौती: इस हिंसा को अक्सर कम रिपोर्ट किया जाता है और अनदेखा किया जाता है क्योंकि यह मर्दाना मानदंडों (जैसे शक्ति, कमजोरी न दिखाना) को चुनौती देता है।
  • सुरक्षा नीतियों के लिए निहितार्थ: संघर्ष में सभी पीड़ितों के लिए सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए पुरुषों और लड़कों के खिलाफ जेंडर-आधारित हिंसा को पहचानना और संबोधित करना महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष:

इन विद्वानों का काम यह स्पष्ट करता है कि युद्ध और संघर्ष जेंडर से गहराई से जुड़े हुए हैं और महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करते हैं। युद्ध मर्दाना आदर्शों को बढ़ावा दे सकता है और महिलाओं को विशिष्ट भूमिकाओं तक सीमित कर सकता है, जबकि यौन हिंसा को अक्सर युद्ध के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। महिलाओं को संघर्षों में केवल पीड़ितों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि वे सक्रिय भूमिकाएँ निभाती हैं। इसके अलावा, पुरुषों और लड़कों को भी जेंडर-आधारित हिंसा का खतरा होता है। युद्ध और संघर्षों के जेंडर आयामों को समझने से हमें अधिक प्रभावी संघर्ष समाधान, शांति निर्माण और सुरक्षा नीतियां बनाने में मदद मिलती है जो सभी पीड़ितों की जरूरतों को संबोधित करती हैं।

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