UNIT III
वैचारिक योगदान – परिचय
इस भाग में हम अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (आईआर) के अध्ययन में जेंडर के कुछ महत्वपूर्ण वैचारिक योगदानों को आसान हिंदी में समझेंगे। पिछले भाग में हमने देखा कि नारीवादी विद्वानों ने मुख्यधारा के आईआर सिद्धांतों को कैसे चुनौती दी और पुरुषत्व व क्वीर सिद्धांतों जैसे नए दृष्टिकोणों को पेश किया। अब हम कुछ खास विचारों पर ध्यान देंगे जो हमें राज्य, संप्रभुता, राष्ट्र और राष्ट्रवाद, और सुरक्षा जैसी आईआर की बुनियादी अवधारणाओं को जेंडर के नजरिए से देखने में मदद करते हैं।
क. राज्य और संप्रभुता (State and Sovereignty):
- पारंपरिक आईआर में राज्य को एक ऐसा अभिनेता माना जाता है जो तर्कसंगत फैसले लेता है और बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त (संप्रभु) होता है।
- नारीवादी विद्वान पूछते हैं कि क्या ‘राज्य’ वास्तव में जेंडर-तटस्थ है? वे दिखाते हैं कि राज्य की संरचनाएं, नीतियां और कानून अक्सर पुरुषों के अनुभवों और दृष्टिकोणों को प्रतिबिंबित करते हैं और महिलाओं के हितों को नजरअंदाज कर सकते हैं।
- ‘संप्रभुता’ की अवधारणा भी जेंडर से मुक्त नहीं है। अक्सर, राज्य की रक्षा और नियंत्रण की बात मर्दाना गुणों (जैसे ताकत, प्रभुत्व) से जुड़ी होती है, जबकि महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के मुद्दे हाशिए पर रह सकते हैं।
- नारीवादी विश्लेषण यह समझने में मदद करता है कि कैसे राज्य और संप्रभुता की अवधारणाएं जेंडर शक्ति संरचनाओं को बनाए रखती हैं और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करती हैं।
ख. राष्ट्र और राष्ट्रवाद (Nation and Nationalism):
- राष्ट्रवाद अक्सर एक ऐसी भावना है जो लोगों को एक साझा पहचान और संस्कृति के आधार पर एकजुट करती है।
- नारीवादी विद्वान दिखाते हैं कि राष्ट्र और राष्ट्रवाद की कहानियों में महिलाओं की भूमिका अक्सर विशिष्ट और सीमित होती है। उन्हें अक्सर राष्ट्र के ‘प्रतीक’ या ‘संरक्षक’ के रूप में दर्शाया जाता है, जबकि राजनीतिक और सैन्य क्षेत्रों में उनकी सक्रिय भागीदारी को कम आंका जाता है।
- राष्ट्रवाद जेंडर भूमिकाओं को मजबूत कर सकता है और महिलाओं के अधिकारों को सीमित कर सकता है। युद्ध और संघर्ष के समय में, राष्ट्रीयता की भावनाएं महिलाओं के शरीर और अधिकारों पर नियंत्रण को भी जन्म दे सकती हैं।
- जेंडर के नजरिए से राष्ट्र और राष्ट्रवाद का अध्ययन करने से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि राष्ट्रीय पहचान कैसे बनती है और यह महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग तरह से कैसे प्रभावित करती है।
ग. सुरक्षा (Security):
- पारंपरिक आईआर में सुरक्षा का मतलब अक्सर राज्य की सैन्य सुरक्षा और बाहरी खतरों से बचाव होता है।
- नारीवादी विद्वान सुरक्षा की इस संकीर्ण परिभाषा को चुनौती देते हैं। वे ‘मानव सुरक्षा’ की अवधारणा पर जोर देते हैं, जिसमें व्यक्तियों और समुदायों की सुरक्षा, जिसमें भोजन, स्वास्थ्य, पर्यावरण और व्यक्तिगत सुरक्षा शामिल है, पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
- जेंडर के नजरिए से देखने पर, यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग प्रकार की असुरक्षाओं का सामना करना पड़ता है। महिलाओं को अक्सर घरेलू हिंसा, यौन हिंसा और संघर्ष से संबंधित हिंसा का अधिक खतरा होता है, जिन्हें पारंपरिक सुरक्षा अध्ययनों में नजरअंदाज किया जाता है।
- सुरक्षा के जेंडर आयाम को समझने से हमें ऐसी नीतियां बनाने में मदद मिलती है जो सभी लोगों की सुरक्षा जरूरतों को प्रभावी ढंग से संबोधित कर सकें।
संक्षेप में, जेंडर के नजरिए से आईआर की बुनियादी अवधारणाओं (राज्य, संप्रभुता, राष्ट्र, राष्ट्रवाद और सुरक्षा) का अध्ययन करने से हमें वैश्विक राजनीति की एक अधिक व्यापक और सटीक तस्वीर मिलती है। यह हमें उन छिपी हुई जेंडर-आधारित शक्ति संरचनाओं को उजागर करने में मदद करता है जो अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को आकार देती हैं और अधिक न्यायसंगत और समावेशी विश्व व्यवस्था की दिशा में काम करने के लिए महत्वपूर्ण है।
: राज्य और संप्रभुता (राज्य और संप्रभुता)
जॉन हॉफमैन की पुस्तक “जेंडर एंड सोवरेनिटी: फेमिनिज्म, द स्टेट एंड इंटरनेशनल रिलेशंस” राज्य और संप्रभुता की पारंपरिक अवधारणाओं को नारीवादी दृष्टिकोण से चुनौती देती है। हॉफमैन का तर्क है कि ये अवधारणाएं जेंडर-तटस्थ नहीं हैं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से मर्दाना विचारों और अनुभवों से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उनका विश्लेषण दर्शाता है कि राज्य और संप्रभुता की हमारी समझ को जेंडर के लेंस से देखने पर कई महत्वपूर्ण पहलू सामने आते हैं।
राज्य का जेंडरीकरण:
- सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का विभाजन: हॉफमैन बताते हैं कि आधुनिक राज्य का उदय सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के एक स्पष्ट विभाजन पर आधारित है। सार्वजनिक क्षेत्र, जिसे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का क्षेत्र माना जाता है, ऐतिहासिक रूप से पुरुषों के प्रभुत्व वाला रहा है। दूसरी ओर, निजी क्षेत्र, जिसमें घर और परिवार शामिल हैं, को महिलाओं का क्षेत्र माना जाता रहा है और इसे राजनीतिक विश्लेषण से अक्सर बाहर रखा गया है। यह विभाजन राज्य की अवधारणा को ही जेंडर-आधारित बनाता है।
- तर्कसंगतता और स्वायत्तता पर जोर: पारंपरिक आईआर सिद्धांत राज्य को एक तर्कसंगत और स्वायत्त अभिनेता के रूप में देखते हैं। हॉफमैन तर्क देते हैं कि ये गुण पारंपरिक रूप से मर्दाना माने जाते हैं, जबकि भावनात्मकता, देखभाल और अंतर्संबंधितता जैसे गुणों को कम महत्व दिया जाता है, भले ही वे राज्य के कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हों।
- पुरुषों का प्रभुत्व: राज्य की संस्थाओं (जैसे विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, सेना) में ऐतिहासिक रूप से पुरुषों का प्रभुत्व रहा है। यह प्रभुत्व नीतियों और कानूनों को आकार देता है जो अक्सर पुरुषों के हितों को प्राथमिकता देते हैं और महिलाओं के अनुभवों और जरूरतों को अनदेखा कर सकते हैं।
संप्रभुता का जेंडरीकरण:
- बाहरी और आंतरिक संप्रभुता: संप्रभुता में मुख्य रूप से दो पहलू होते हैं: बाहरी संप्रभुता (अन्य राज्यों से स्वतंत्रता) और आंतरिक संप्रभुता (अपने क्षेत्र के भीतर अधिकार)। हॉफमैन दिखाते हैं कि दोनों ही पहलू जेंडर से प्रभावित हैं। बाहरी संप्रभुता की रक्षा अक्सर सैन्य शक्ति और ‘मर्दाना’ गुणों (जैसे साहस, दृढ़ता) से जुड़ी होती है। आंतरिक संप्रभुता के तहत, राज्य अक्सर महिलाओं के शरीर और अधिकारों पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास करता है, जो जेंडर शक्ति संरचनाओं को दर्शाता है।
- सुरक्षा का मर्दाना दृष्टिकोण: संप्रभुता की रक्षा का तर्क अक्सर सैन्य सुरक्षा और बाहरी खतरों पर केंद्रित होता है। महिलाओं द्वारा अनुभव की जाने वाली असुरक्षाएं, जैसे घरेलू हिंसा या यौन हिंसा, जिन्हें राज्य के भीतर ‘निजी’ मामले माना जाता है, को अक्सर संप्रभुता के मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाता है।
- अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप का औचित्य: हॉफमैन यह भी विश्लेषण करते हैं कि संप्रभुता के उल्लंघन को सही ठहराने के लिए जेंडर का उपयोग कैसे किया जाता है। उदाहरण के लिए, महिलाओं के अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर मानवीय हस्तक्षेप को उचित ठहराया जा सकता है, लेकिन यह अक्सर पश्चिमी मर्दाना दृष्टिकोणों पर आधारित होता है और स्थानीय संदर्भों को अनदेखा कर सकता है।
आइरिस मैरियन यंग का नज़रिया:
यंग अपने लेख “द लॉजिक ऑफ मैस्कुलिनिस्ट प्रोटेक्शन” में ‘मर्दाना सुरक्षा’ (masculinist protection) के विचार पर ध्यान केंद्रित करती हैं:
- मर्द का रक्षक के रूप में विचार: यंग कहती हैं कि राज्य अक्सर खुद को एक ऐसे ‘मर्द’ के रूप में पेश करता है जो अपनी ‘महिला’ नागरिकों को बाहरी खतरों से बचाता है। इस सोच में औरतें कमजोर और ज़रूरतमंद मानी जाती हैं जिन्हें सुरक्षा की ज़रूरत है, जबकि मर्द ताकतवर रक्षक के रूप में देखे जाते हैं।
- सुरक्षा का सीमित दायरा: इस ‘मर्दाना सुरक्षा’ की सोच में सुरक्षा का मतलब ज़्यादातर बाहरी सैन्य खतरों से बचाव होता है। औरतों द्वारा अनुभव की जाने वाली असुरक्षाएं, जैसे घर में हिंसा या यौन उत्पीड़न, जिन्हें ‘निजी’ मामले माना जाता है, को राज्य की सुरक्षा के मुद्दे के तौर पर नहीं देखा जाता।
- अधिकार और स्वायत्तता में कमी: जब राज्य औरतों को सिर्फ सुरक्षा की ज़रूरत वाली कमजोर इकाई के तौर पर देखता है, तो उनके अपने अधिकार और फैसले लेने की क्षमता को कम आंका जाता है।
नारीवादी परिप्रेक्ष्य:
हॉफमैन और आइरिस मैरियन यंग का काम नारीवादी परिप्रेक्ष्य से राज्य और संप्रभुता की पारंपरिक समझ को चुनौती देता है। उनका तर्क है कि:
- राज्य जेंडर-तटस्थ नहीं है: राज्य की संरचना और कार्यप्रणाली जेंडर मानदंडों और शक्ति संरचनाओं से गहराई से प्रभावित होती है।
- संप्रभुता एक जेंडर-आधारित अवधारणा है: इसकी व्याख्या और अभ्यास जेंडर विचारों और शक्ति संबंधों से आकार लेता है।
- महिलाओं के अनुभव महत्वपूर्ण हैं: राज्य और संप्रभुता के विश्लेषण में महिलाओं के अनुभवों और दृष्टिकोणों को शामिल करना आवश्यक है ताकि एक अधिक संपूर्ण और सटीक समझ प्राप्त की जा सके।
निष्कर्ष:
हॉफमैन की “जेंडर एंड सोवरेनिटी और आइरिस मैरियन यंग की ” द लॉजिक ऑफ मैस्कुलिनिस्ट प्रोटेक्शन यह स्पष्ट करती है कि राज्य और संप्रभुता की पारंपरिक अवधारणाएं जेंडर से मुक्त नहीं हैं। नारीवादी दृष्टिकोण से इन अवधारणाओं का विश्लेषण करने से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि कैसे जेंडर शक्ति संरचनाएं राज्य के कामकाज और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करती हैं। यह हमें राज्य और संप्रभुता की एक अधिक आलोचनात्मक और समावेशी समझ विकसित करने के लिए प्रेरित करता है जो सभी नागरिकों की जरूरतों और अनुभवों को ध्यान में रखती है।
: राष्ट्र और राष्ट्रवाद
जोआन नेगेल और सिंथिया एन्लो जैसे नारीवादी विद्वानों ने ‘राष्ट्र’ (nation) और ‘राष्ट्रवाद’ (nationalism) की पारंपरिक अवधारणाओं का एक गहन और विस्तृत जेंडर विश्लेषण प्रस्तुत किया है। उनका कार्य यह दर्शाता है कि राष्ट्र और राष्ट्रवाद की भावनाएं, जिन्हें अक्सर सार्वभौमिक और जेंडर-तटस्थ माना जाता है, वास्तव में मर्दाना आदर्शों, जेंडर भूमिकाओं और यौनता से जटिल रूप से जुड़ी हुई हैं। इन विद्वानों का विश्लेषण हमें राष्ट्रीय पहचानों के निर्माण, राष्ट्रवादी विचारधाराओं के प्रसार और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर उनके प्रभाव को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण लेंस प्रदान करता है।
जोआन नेगेल का विस्तृत परिप्रेक्ष्य:
नेगेल अपने प्रभावशाली लेख “मैस्कुलिनिटी एंड नेशनलिज्म: जेंडर एंड सेक्सुअलिटी इन द मेकिंग ऑफ नेशंस” में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रियाओं और राष्ट्रवादी भावनाओं के उद्भव में मर्दानगी और जेंडर संबंधों की केंद्रीय भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डालती हैं। उनका तर्क है कि राष्ट्र केवल साझा संस्कृति, भाषा या क्षेत्र का एक समूह नहीं है, बल्कि यह जेंडर और यौनता के विशिष्ट सामाजिक निर्माणों पर आधारित एक ‘कल्पित समुदाय’ है।
- मर्दानगी का राष्ट्र निर्माण में प्रभुत्व: नेगेल बताती हैं कि राष्ट्र के निर्माण की कथाओं में अक्सर मर्दाना गुणों जैसे बहादुरी, शारीरिक शक्ति, सैन्य कौशल, नेतृत्व और पितृत्व को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। ‘राष्ट्रपिता’, ‘राष्ट्र के संस्थापक’ और ‘राष्ट्र के रक्षक’ जैसी प्रतिष्ठित छवियां मर्दाना आदर्शों को मूर्त रूप देती हैं और राष्ट्रीय पहचान के लिए बेंचमार्क स्थापित करती हैं। यह मर्दाना प्रभुत्व राष्ट्रीय इतिहास के आख्यानों, स्मारकों और प्रतीकों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो राष्ट्र के ‘सार’ के रूप में मर्दाना गुणों को स्थापित करता है।
- महिलाओं की जेंडरीकृत भूमिकाएँ: नेगेल विश्लेषण करती हैं कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रियाओं में महिलाओं की भूमिकाओं को अक्सर विशिष्ट और सीमित जेंडर अपेक्षाओं के अनुसार ढाला जाता है। उन्हें मुख्य रूप से जैविक और सांस्कृतिक प्रजननकर्ता के रूप में देखा जाता है – ‘राष्ट्र के भविष्य’ को जन्म देने वाली माताएं और राष्ट्रीय संस्कृति, मूल्यों और परंपराओं की वाहक। उनकी राजनीतिक भागीदारी, नागरिकता के अधिकार और सैन्य क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका को अक्सर हाशिए पर रखा जाता है या कम महत्व दिया जाता है। महिलाओं को राष्ट्रीय समुदाय की सीमाओं के प्रतीक के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है, उनकी पवित्रता और नैतिकता को राष्ट्रीय पहचान के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
- यौनता और राष्ट्रीय सीमाएँ: नेगेल राष्ट्रवाद और यौनता के बीच जटिल संबंधों की पड़ताल करती हैं। वह तर्क देती हैं कि यौनता का उपयोग न केवल व्यक्तिगत संबंधों को विनियमित करने के लिए किया जाता है, बल्कि राष्ट्रीय सीमाओं और पहचानों को परिभाषित करने के लिए भी किया जाता है। ‘राष्ट्रीय महिलाएं’ अक्सर पारंपरिक यौन मानदंडों और नैतिकता की प्रतीक के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं, जबकि ‘बाहरी’ या ‘अवांछित’ यौनता (जैसे अंतरजातीय संबंध, गैर-विषमलिंगी यौनता) को राष्ट्रीय समुदाय के लिए खतरा माना जा सकता है। इस प्रकार, यौनता राष्ट्रीय ‘हम’ और ‘वे’ की सीमाओं को मजबूत करने का एक शक्तिशाली उपकरण बन जाती है।
- समलैंगिकता और राष्ट्रवादी समावेश/बहिष्कार: नेगेल राष्ट्रवाद के संदर्भ में समलैंगिकता के विवादास्पद संबंधों का भी विश्लेषण करती हैं। वह दिखाती हैं कि कई राष्ट्रवादी विचारधाराएं विषमलैंगिक मानदंडों पर आधारित होती हैं, जिससे समलैंगिक व्यक्तियों को ‘राष्ट्र के भीतर बाहरी’ या ‘असामान्य’ के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, कुछ मामलों में, एलजीबीटीक्यू+ अधिकारों को राष्ट्रीय प्रगतिशीलता के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसा कि जसबीर पुआर के ‘होमोनेशनलिज्म’ के सिद्धांत में दर्शाया गया है, लेकिन यह अक्सर अन्य प्रकार के बहिष्कार और पदानुक्रमों को जन्म दे सकता है।
सिंथिया एन्लो का व्यापक विश्लेषण:
एन्लो, अपनी प्रभावशाली पुस्तक “बैनानास, बीचेस एंड बेसेस” में, राष्ट्रवाद और मर्दानगी के बीच गहरे और अक्सर अनदेखे संबंधों पर लगातार जोर देती हैं। उनका विश्लेषण अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विभिन्न पहलुओं में जेंडर की सर्वव्यापी भूमिका को उजागर करता है, जिसमें राष्ट्रवाद एक महत्वपूर्ण पहलू है।
- राष्ट्रवादी कथा का मर्दाना आधार और महिलाओं का अदृश्य श्रम: एन्लो का तर्क है कि राष्ट्रवाद की ‘महान’ कहानियाँ, जो राष्ट्रीय इतिहास, उपलब्धियों और आकांक्षाओं का वर्णन करती हैं, अक्सर पुरुषों के अनुभवों, दृष्टिकोणों और बलिदानों पर केंद्रित होती हैं। महिलाओं का योगदान, विशेष रूप से अवैतनिक श्रम, देखभाल का काम और पर्दे के पीछे की राजनीतिक गतिविधियाँ, अक्सर अदृश्य या महत्वहीन मानी जाती हैं। यह मर्दाना पूर्वाग्रह राष्ट्रीय स्मृति और पहचान को आकार देता है।
- अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में मर्दानगी का प्रदर्शन और राष्ट्रीय पहचान: एन्लो दिखाती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में राज्यों का व्यवहार अक्सर मर्दाना आदर्शों (जैसे सैन्य शक्ति का प्रदर्शन, क्षेत्रीय विस्तार की महत्वाकांक्षा, प्रभुत्व की खोज) से प्रभावित होता है। ‘मर्दाना राष्ट्र’ की छवि, जो मजबूत, आत्मनिर्भर और बाहरी खतरों से अपनी सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम है, राष्ट्रीय गौरव और अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
- महिलाओं का राष्ट्रीय प्रतीकों और सीमाओं के रूप में उपयोग: एन्लो इस बात पर जोर देती हैं कि महिलाओं के शरीर और प्रजनन क्षमता का उपयोग अक्सर राष्ट्रीय सीमाओं को चित्रित करने, राष्ट्रीय संस्कृति को बनाए रखने और राष्ट्रीय पहचान को पुन: पेश करने के लिए किया जाता है। महिलाओं को ‘राष्ट्र की माताएं’, ‘संस्कृति की वाहक’ या ‘परंपरा की रक्षक’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे उनके व्यक्तिगत अधिकार, स्वायत्तता और विविधता अक्सर गौण हो जाते हैं। राष्ट्रीय सम्मान और प्रतिष्ठा अक्सर महिलाओं के व्यवहार और उपस्थिति से जुड़ी होती है।
- राष्ट्रवाद का जटिल, बहुस्तरीय और स्थानीयकृत स्वरूप: एन्लो राष्ट्रवाद को एक सरल और एक समान घटना के रूप में देखने के खिलाफ चेतावनी देती हैं। वह जोर देती हैं कि राष्ट्रवाद विभिन्न स्तरों पर (स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय) और विभिन्न रूपों में (जातीय राष्ट्रवाद, नागरिक राष्ट्रवाद) प्रकट होता है, और इसके जेंडर आयाम प्रत्येक संदर्भ में विशिष्ट और जटिल होते हैं। महिलाओं की भूमिकाएँ और अनुभव राष्ट्रवादी आंदोलनों और विचारधाराओं के भीतर भिन्न हो सकते हैं।
निष्कर्ष:
नेगेल और एन्लो का गहन विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्र और राष्ट्रवाद की भावनाएं जेंडर और कामुकता से गहराई से जुड़ी हुई हैं। राष्ट्रीय पहचानों का निर्माण, राष्ट्रवादी विचारधाराओं का प्रसार और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर उनका प्रभाव जेंडर शक्ति संरचनाओं, मर्दाना आदर्शों और यौन मानदंडों से अछूता नहीं है। इन विद्वानों का कार्य हमें राष्ट्रवाद के जेंडर आयामों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने और यह समझने के लिए एक आवश्यक ढांचा प्रदान करता है कि राष्ट्रीय पहचानें कैसे बनती हैं, कैसे कायम रहती हैं और महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग तरीकों से कैसे प्रभावित करती हैं। यह समझ अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक न्याय के लिए महत्वपूर्ण है।
“सुरक्षा”
सुरक्षा की पारंपरिक अवधारणा, जैसा कि हमने पहले भी देखा, मुख्य रूप से राज्य-केंद्रित और सैन्य खतरों पर केंद्रित रही है। लेकिन नारीवादी विद्वानों ने इस संकीर्ण परिभाषा को चुनौती दी है और ‘सुरक्षा’ को जेंडर के नजरिए से देखने पर जोर दिया है। जोनाथन डी. वैडली, जेनिफर मारुस्का, मिया ब्लूम और एन्निक टी.आर. विब्बेन जैसे विद्वानों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
जोनाथन डी. वैडली: राज्य का जेंडरीकरण और सुरक्षा में प्रदर्शन
वैडली अपने लेख “जेंडरिंग द स्टेट: परफॉर्मेंसिटिविटी एंड प्रोटेक्शन इन इंटरनेशनल सिक्योरिटी” में तर्क देते हैं कि ‘राज्य’ की अवधारणा और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा में इसकी भूमिका जेंडर से गहराई से जुड़ी हुई है। उनका मुख्य विचार यह है कि राज्य अक्सर ‘मर्दाना रक्षक’ की भूमिका निभाता है और इस भूमिका को ‘प्रदर्शन’ (performativity) के माध्यम से बनाए रखता है।
- राज्य का मर्दाना प्रदर्शन: वैडली कहते हैं कि राज्य अपनी शक्ति और संप्रभुता को प्रदर्शित करने के लिए कुछ खास ‘मर्दाना’ व्यवहार करता है, जैसे सैन्य शक्ति का प्रदर्शन, सीमाओं पर नियंत्रण और बाहरी खतरों से अपनी ‘कमजोर’ आबादी की रक्षा करने का दावा करना। यह प्रदर्शन अंतर्राष्ट्रीय मंच पर राज्य की ‘मर्दाना’ पहचान को मजबूत करता है।
- सुरक्षा में जेंडर भूमिकाएँ: इस सोच में, नागरिकों को अक्सर ‘रक्षा करने योग्य’ के रूप में देखा जाता है, जबकि राज्य ‘रक्षक’ की भूमिका निभाता है। यह जेंडर-आधारित है क्योंकि ‘रक्षा करने योग्य’ की भूमिका अक्सर महिलाओं और बच्चों से जुड़ी होती है, जबकि ‘रक्षक’ की भूमिका पुरुषों से।
- सुरक्षा की सीमित परिभाषा: इस ‘मर्दाना सुरक्षा’ की अवधारणा बाहरी सैन्य खतरों पर ध्यान केंद्रित करती है और महिलाओं द्वारा अनुभव की जाने वाली अन्य प्रकार की असुरक्षाओं (जैसे घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न) को अनदेखा करती है, जिन्हें ‘निजी’ मामले माना जाता है।
जेनिफर मारुस्का: राज्य कब ‘अति-मर्दाना’ होते हैं?
मारुस्का अपने लेख “व्हेन आर स्टेट्स हाइपरमैस्कुलिन?” में यह सवाल उठाती हैं कि कब राज्य अपनी मर्दाना पहचान पर अत्यधिक जोर देते हैं और इसके अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
- अति-मर्दानगी की अवधारणा: मारुस्का ‘अति-मर्दानगी’ (hypermasculinity) को मर्दाना गुणों (जैसे आक्रामकता, प्रभुत्व की इच्छा, भावनात्मक नियंत्रण का अभाव) का एक अतिरंजित रूप मानती हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव: उनका तर्क है कि जब राज्य अपनी मर्दाना पहचान पर अत्यधिक जोर देते हैं, तो वे अधिक आक्रामक विदेश नीतियां अपना सकते हैं, सैन्य खर्च बढ़ा सकते हैं और कूटनीति के बजाय बल का उपयोग करने की अधिक संभावना रखते हैं। यह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में तनाव और संघर्ष को बढ़ा सकता है।
- आंतरिक दमन: अति-मर्दाना राज्य अक्सर आंतरिक रूप से भी दमनकारी हो सकते हैं, जेंडर और यौन अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित कर सकते हैं और पारंपरिक जेंडर भूमिकाओं को मजबूत कर सकते हैं।
मिया ब्लूम: महिला आत्मघाती हमलावर – एक वैश्विक रुझान
ब्लूम अपने लेख “फीमेल सुसाइड बॉम्बर्स: ए ग्लोबल ट्रेंड” में आत्मघाती हमलावरों के पारंपरिक मर्दाना चित्रण को चुनौती देती हैं और महिला आत्मघाती हमलावरों की बढ़ती संख्या और उनके प्रेरणाओं का विश्लेषण करती हैं।
- पारंपरिक धारणा को चुनौती: ब्लूम दिखाती हैं कि आत्मघाती हमला एक ऐसा कार्य है जिसे अक्सर मर्दाना बहादुरी और बलिदान से जोड़ा जाता है। महिला आत्मघाती हमलावरों का उदय इस धारणा को चुनौती देता है।
- प्रेरणाओं की जटिलता: ब्लूम तर्क देती हैं कि महिला आत्मघाती हमलावरों की प्रेरणाएं जटिल और विविध होती हैं, जिनमें राजनीतिक, सामाजिक, व्यक्तिगत और जेंडर-विशिष्ट कारक शामिल हो सकते हैं। उन्हें अक्सर पितृसत्तात्मक समाजों में हाशिए पर धकेल दिया जाता है और वे हिंसा के शिकार हो सकती हैं। आत्मघाती हमला उनके लिए प्रतिरोध, बदला लेने या राजनीतिक आवाज उठाने का एक तरीका हो सकता है।
- सुरक्षा नीतियों के लिए निहितार्थ: महिला आत्मघाती हमलावरों की वास्तविकता सुरक्षा नीतियों के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ रखती है, क्योंकि पारंपरिक आतंकवाद विरोधी रणनीतियां अक्सर पुरुष आतंकवादियों पर केंद्रित होती हैं और महिलाओं की भूमिकाओं और प्रेरणाओं को समझने में विफल रहती हैं।
एन्निक टी.आर. विब्बेन: नारीवादी सुरक्षा अध्ययन – एक कथात्मक दृष्टिकोण
विब्बेन अपनी पुस्तक “फेमिनिस्ट सिक्योरिटी स्टडीज: ए नैरेटिव अप्रोच” में सुरक्षा का अध्ययन करने के लिए एक नारीवादी कथात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं।
- कथाओं का महत्व: विब्बेन तर्क देती हैं कि हम सुरक्षा को कैसे समझते हैं, यह उन कहानियों से आकार लेता है जो हम खुद को और दूसरों को बताते हैं। नारीवादी सुरक्षा अध्ययन उन जेंडर-आधारित कथाओं को उजागर करने और चुनौती देने का प्रयास करता है जो सुरक्षा की हमारी समझ को सीमित करते हैं।
- हाशिए के अनुभवों को शामिल करना: नारीवादी कथात्मक दृष्टिकोण उन लोगों की कहानियों को केंद्र में लाता है जिन्हें पारंपरिक सुरक्षा अध्ययनों में अक्सर अनदेखा किया जाता है, खासकर महिलाओं और अन्य हाशिए के समूहों के सुरक्षा संबंधी अनुभव।
- सुरक्षा की व्यापक समझ: विब्बेन सुरक्षा की एक व्यापक समझ पर जोर देती हैं जिसमें न केवल सैन्य खतरे बल्कि सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत असुरक्षाएं भी शामिल हैं, जो जेंडर संबंधों से गहराई से जुड़ी होती हैं।
निष्कर्ष:
इन विद्वानों का काम यह स्पष्ट करता है कि ‘सुरक्षा’ की अवधारणा जेंडर से मुक्त नहीं है। राज्य का व्यवहार, हिंसा के स्वरूप और असुरक्षा के अनुभव जेंडर भूमिकाओं, अपेक्षाओं और शक्ति संरचनाओं से गहराई से प्रभावित होते हैं। सुरक्षा के जेंडर आयाम को समझने से हमें एक अधिक व्यापक, समावेशी और प्रभावी सुरक्षा नीति बनाने में मदद मिलती है जो सभी लोगों की जरूरतों को संबोधित करती है।
